
मुंबई : (Mumbai) बॉम्बे हाईकोर्ट (Bombay High Court) ने मानहानि के एक मामले में कहा कि अदालत में सत्य मजबूत बचाव हो सकता है, लेकिन सोशल मीडिया पर किसी को बिना साबित हुए ‘घोटालेबाज’, ‘धोखेबाज’ और ‘भ्रष्ट’ (‘scamster’, ‘fraud’, or ‘corrupt’) कहना पहली नजर में अपमानजनक प्रतीत होता है। अदालत ने कांदिवली के एक बड़े पुनर्विकास परियोजना से जुड़े विवाद में बिल्डर को अंतरिम राहत देते हुए एक एक्टिविस्ट को सोशल मीडिया पर किए गए विवादित पोस्ट, वीडियो और संदेश हटाने तथा भविष्य में इस तरह की सामग्री साझा नहीं करने का निर्देश दिया। मामले की अगली सुनवाई 31 अगस्त को होगी।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को भी रोक लगाने के निर्देश
न्यायमूर्ति अभय आहूजा (Justice Abhay Ahuja) ने कहा कि विवादित टिप्पणियां न केवल बिल्डर की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाती हैं, बल्कि उसके व्यावसायिक हितों और अनुबंधों में भी हस्तक्षेप करती हैं। अदालत ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और अन्य संबंधित पक्षों को भी इन पोस्टों के प्रसार पर रोक लगाने का निर्देश दिया। बिल्डर का आरोप है कि एक्टिविस्ट ने फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप पर कंपनी और म्हाडा (MHADA on Facebook, Instagram, and WhatsApp) के खिलाफ झूठे एवं भ्रामक आरोप लगाकर परियोजना का बहिष्कार करने की अपील की थी। वहीं, एक्टिविस्ट की ओर से दलील दी गई कि उनके सभी आरोप सत्य हैं और मानहानि के मामलों में सत्य सबसे प्रभावी बचाव माना जाता है।
