
नई दिल्ली : (New Delhi) लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी (Rahul Gandhi) ने गुरुवार को मध्य प्रदेश की केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना (Ken-Betwa river-linking project in Madhya Pradesh) के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे एक प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात की। उन्होंने प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों की समस्याएं सुनीं और उनकी चिंताओं को आगे उठाने का आश्वासन दिया। राहुल गांधी ने प्रभावित लोगों को भरोसा दिलाया कि उनके साथ अन्याय नहीं होने दिया जाएगा।
राहुल गांधी से मुलाकात के दौरान प्रतिनिधिमंडल ने केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना के कारण आदिवासियों और अन्य स्थानीय लोगों के विस्थापन, पुनर्वास और मुआवजे से जुड़ी समस्याओं को उनके सामने रखा। प्रभावित लोगों ने परियोजना के चलते अपनी जमीन, घर और आजीविका पर पड़ने वाले असर से भी उन्हें अवगत कराया।
यह मुलाकात ऐसे समय हुई है जब केन-बेतवा परियोजना को लेकर मध्य प्रदेश के छतरपुर और पन्ना जिलों में आदिवासी, किसान और स्थानीय ग्रामीण विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रभावित लोगों की प्रमुख चिंताओं में विस्थापन, मुआवजे में देरी, पुनर्वास की व्यवस्था और वन अधिकारों से जुड़े मुद्दे शामिल हैं।
इससे पहले 5 अगस्त को राहुल गांधी ने लोकसभा में केन-बेतवा नदी जोड़ परियोजना से प्रभावित आदिवासी परिवारों के विस्थापन और पुनर्वास से जुड़ा सवाल भी उठाया था। राहुल गांधी और समाजवादी पार्टी के सांसद अजेंद्र सिंह लोधी (Ajendra Singh Lodhi) ने जनजातीय मामलों के मंत्रालय (Ministry of Tribal Affairs) से परियोजना से प्रभावित परिवारों का विवरण और विरोध कर रहे आदिवासी समुदायों की शिकायतों पर सरकार की ओर से की गई कार्रवाई के बारे में जानकारी मांगी थी।
जनजातीय मामलों के राज्य मंत्री दुर्गादास उइके (Durgadas Uikey) ने लिखित जवाब में बताया कि मंत्रालय को केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना के कारण विस्थापन से संबंधित कई अभ्यावेदन मिले हैं। इन अभ्यावेदनों की जांच के बाद उन्हें मध्य प्रदेश सरकार और संबंधित जिला प्रशासन (district administration) को जांच तथा आवश्यक कार्रवाई के लिए भेजा गया है। केंद्र ने कहा है कि वन अधिकार कानून का क्रियान्वयन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की जिम्मेदारी है।
उल्लेखनीय है कि केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना देश की पहली नदी जोड़ो परियोजना है। इसके तहत मध्य प्रदेश की केन नदी के पानी को उत्तर प्रदेश की बेतवा नदी तक पहुंचाया जाना है। परियोजना में बांध के अलावा नहरों और सुरंगों का निर्माण शामिल है। परियोजना से बुंदेलखंड क्षेत्र में सिंचाई, पेयजल और बिजली की उपलब्धता बढ़ेगी।
परियोजना की अनुमानित लागत करीब 44 हजार करोड़ रुपये से अधिक है। सरकार के अनुसार इससे बुंदेलखंड में करीब 10.62 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई सुविधा उपलब्ध होगी और करीब 62 लाख लोगों को पेयजल का लाभ मिलेगा।
हालांकि, परियोजना से प्रभावित लोगों का कहना है कि विकास के विरोध के बजाय उनकी चिंता उचित पुनर्वास, पारदर्शी मुआवजे और वन एवं जमीन से जुड़े अधिकारों को लेकर है। आंदोलनकारियों की ओर से हर वयस्क को अलग लाभार्थी मानने, मुआवजा और पुनर्वास की प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने, जमीन के बदले जमीन और सुविधाओं से युक्त पुनर्वास स्थल उपलब्ध कराने तथा ग्रामसभा और वन अधिकार कानून के प्रावधानों का पालन करने की मांग की जा रही है।
परियोजना को लेकर पर्यावरणीय प्रभाव भी विरोध का एक प्रमुख मुद्दा है। आंदोलनकारियों की ओर से पन्ना टाइगर रिजर्व और आसपास के वन क्षेत्र पर परियोजना के संभावित प्रभाव तथा बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई को लेकर चिंता जताई जाती रही है।
