
मुंबई : (Mumbai) बंबई उच्च न्यायालय (Bombay High Court) ने मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) के खिलाफ कथित आपत्तिजनक टिप्पणी से जुड़े मानहानि मामले में कांग्रेस नेता राहुल गांधी (Congress leader Rahul Gandhi) को 2019 में जारी समन को रद्द करने की याचिका खारिज कर दिया है।
जस्टिस एन. आर. बोरकर (Justice N.R. Borkar) की सिंगल बेंच ने गिरगांव मजिस्ट्रेट न्यायालय (Girgaon Magistrate Court) के 28 अगस्त 2019 के आदेश को चुनौती देने वाली राहुल गांधी की याचिका पर यह फैसला सुनाया। न्यायालय ने कहा कि मजिस्ट्रेट के आदेश में कोई ऐसी गलती या गैर-कानूनी बात नहीं है, जिसके आधार पर उच्च न्यायालय को दखल देना चाहिए।
उच्च न्यायालय में आज हो रही सुनवाई के दौरान न्यायालय ने अपने नवंबर 2021 के आदेश को बरकरार रखा। इस आदेश में मजिस्ट्रेट को मानहानि की शिकायत पर सुनवाई छह हफ्ते तक टालने का निर्देश दिया गया था, ताकि राहुल गांधी फैसले के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में अपील कर सकें। इसका मतलब है कि फिलहाल उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश होने की जरूरत नहीं होगी।
यह मानहानि शिकायत 2018 में राफेल फाइटर जेट डील (Rafale fighter jet deal) को लेकर राहुल गांधी की प्रधानमंत्री मोदी पर की गई टिप्पणी से जुड़ी है। आरोप है कि सितंबर 2018 में राजस्थान की एक सार्वजनिक रैली में राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी को “कमांडर-इन-थीफ” कहा था। इसके बाद शिकायतकर्ता एमएच श्रीश्रीमल ने खुद को भाजपा का सदस्य बताते हुए आरोप लगाया था कि राहुल गांधी ने रैली में दिए भाषण के अलावा अपने व्यक्तिगत एक्स (पूर्व में ट्विटर) अकाउंट पर भी इसी तरह की टिप्पणी वाला वीडियो पोस्ट किया था। शिकायतकर्ता के मुताबिक, राहुल गांधी की इन टिप्पणियों से प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा के सदस्यों को बदनाम किया गया। उनका आरोप था कि इन बयानों में प्रधानमंत्री पर चोरी के सीधे आरोप लगाए गए थे।
इस आरोप के बाद राहुल गांधी की ओर से वकील सुदीप पासबोला और कुशल मोर (Sudeep Pasbola and Kushal Mor) ने दलील दी कि शिकायतकर्ता इस मामले में पीडि़त पक्ष नहीं है और इसलिए उसे ऐसी मानहानि की शिकायत दर्ज कराने का अधिकार नहीं था। लेकिन इसके बाद शिकायतकर्ता के वकील ने राहुल गांधी के वकील की जिरह का विरोध किया था। इसके बाद आज उच्च न्यायालय ने राहुल गांधी की याचिका खारिज करते हुए कहा कि उसे निचली अदालत के आदेश में कोई ऐसी कमी नहीं मिली, जिसके आधार पर उसमें हस्तक्षेप किया जाए।
