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Nagpur : बंदूक के साए से निकलकर नागपुर आईआईएम पहुंचे आदिवासी छात्र

Nagpur: Tribal students escape the shadow of guns and reach IIM Nagpur

संघर्ष से सपनों तक की प्रेरक यात्रा
गड़चिरौली-चंद्रपुर के 18 विद्यार्थियों ने देखा आईआईएम का विश्वस्तरीय परिसर
नागपुर : (Nagpur)
कभी गोलियों की आवाज, बारूद की गंध और नक्सली हिंसा के भय के बीच जीवन बिताने वाले महाराष्ट्र के गड़चिरौली और चंद्रपुर के आदिवासी अंचलों के 18 छात्र अब नए सपनों और नई उम्मीदों के साथ भारतीय प्रबंधन संस्थान (Indian Institute of Management) (IIM) नागपुर पहुंचे। विश्वस्तरीय शैक्षणिक वातावरण को देखकर विद्यार्थियों की आंखों में उज्ज्वल भविष्य के सपने साफ झलकने लगे। इस दौरान आईआईएम नागपुर के निदेशक डॉ. भीमराया मैत्री ने विद्यार्थियों से आत्मीय संवाद करते हुए अपने संघर्षपूर्ण जीवन की कहानी साझा की और उन्हें शिक्षा के माध्यम से जीवन बदलने का संदेश दिया।

महाराष्ट्र के कई जिले लंबे समय तक नक्सली हिंसा से प्रभावित रहे हैं। हालांकि, केंद्र और राज्य सरकारों के संयुक्त प्रयासों तथा सुरक्षा बलों की कार्रवाई के बाद इन क्षेत्रों में हालात तेजी से बदले हैं। जंगलों में अब भय की जगह शिक्षा, विकास और आत्मनिर्भरता की नई उम्मीद दिखाई देने लगी है। इसी परिवर्तन की बयार के बीच चंद्रपुर की सामाजिक संस्था जागृत ने गड़चिरौली और चंद्रपुर (Gadchiroli and Chandrapur) के 12 छात्र एवं 6 छात्राओं के लिए विशेष शैक्षणिक अध्ययन यात्रा का आयोजन किया। इसके तहत विद्यार्थियों को आईआईएम नागपुर का भ्रमण कराया गया।

विश्वस्तरीय परिसर, आधुनिक शैक्षणिक भवन, विशाल पुस्तकालय और अत्याधुनिक सुविधाओं को देखकर छात्र-छात्राएं उत्साहित हो उठे। उनके लिए यह केवल एक संस्थान का भ्रमण नहीं, बल्कि अपने सपनों को नई दिशा देने वाला अनुभव साबित हुआ।

इस अवसर पर आईआईएम नागपुर के निदेशक डॉ. भीमराया मैत्री (Dr. Bhimraya Maitri, Director of IIM Nagpur) ने औपचारिक संबोधन के बजाय परिवार के मुखिया की तरह छात्रों से खुलकर संवाद किया। उन्होंने अपने बचपन के संघर्षों का उल्लेख करते हुए बताया कि वे महाराष्ट्र के सतारा जिले के जत-आटपाडी क्षेत्र के एक अत्यंत पिछड़े गांव से आते हैं, जहां उस समय उच्च माध्यमिक विद्यालय तक उपलब्ध नहीं था। कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने निरंतर परिश्रम किया और शिक्षा के बल पर आज इस मुकाम तक पहुंचे।

उन्होंने विद्यार्थियों से कहा, “आपके माता-पिता अशिक्षित हैं, यह आपकी शिक्षा में बाधा नहीं बन सकता। यदि लक्ष्य स्पष्ट हो और मेहनत ईमानदारी से की जाए तो कोई भी परिस्थिति सफलता का रास्ता नहीं रोक सकती।”

संवाद के दौरान एक छात्रा ने पूछा कि जीवन में अधिक महत्वपूर्ण क्या है- हार्ड वर्क या स्मार्ट वर्क? इस पर डॉ. मैत्री ने कहा, “कठोर परिश्रम का कोई विकल्प नहीं है। जब आपकी मेहनत परिणाम देने लगती है, तभी वही अपने आप स्मार्ट वर्क बन जाती है।”

कार्यक्रम में आईआईएम नागपुर के प्रो. शैलेंद्र निगम (Professor Shailendra Nigam of IIM Nagpur) ने भी छात्रों को संस्थान की विकास यात्रा, शिक्षण प्रणाली और उच्च शिक्षा के अवसरों की जानकारी दी। उन्होंने आर्थिक कठिनाइयों को लेकर छात्रों की आशंकाओं को दूर करते हुए कहा कि आईआईएम जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रतिभा और परिश्रम सबसे बड़ी पूंजी हैं। उन्होंने मेरिट एवं आवश्यकता आधारित छात्रवृत्तियों, सरकारी योजनाओं तथा शिक्षा ऋण की सुविधाओं की जानकारी देते हुए विद्यार्थियों से कहा, “पैसे की चिंता छोड़िए, केवल मेहनत पर ध्यान दीजिए। आपकी सफलता ही आपके परिवार, समाज और देश का गौरव बनेगी।”

आईआईएम नागपुर का यह अनुभव आदिवासी छात्रों के लिए जीवन बदल देने वाला साबित हुआ। जब उन्होंने देखा कि देश के एक शीर्ष प्रबंधन संस्थान के निदेशक भी उन्हीं जैसी विषम परिस्थितियों से निकलकर इस मुकाम तक पहुंचे हैं, तो उनके भीतर भी बड़े लक्ष्य हासिल करने का नया आत्मविश्वास जाग उठा।

इस अध्ययन दौरे में अजय महाका, रंजू मडावी, निलेश मडावी, बालाजी कलंगा, लक्ष्मी दुर्वे, मोनिका कोटनाके, अजय कोडापे, शंकर कन्नाके, राजू कलंगा और चिन्ना महाका सहित अन्य विद्यार्थी शामिल रहे। अपने गांव लौटते समय उनके साथ केवल आईआईएम की यादें ही नहीं, बल्कि बड़े सपनों को साकार करने का दृढ़ संकल्प भी था।