
इज़राइल को मान्यता मिलने पर ही आगे बढ़ेगी डील
वॉशिंगटन : (Washington) अमेरिका और सऊदी अरब (US and Saudi Arabia) के बीच हुए अहम परमाणु सहयोग समझौते को लेकर व्हाइट हाउस ने बड़ा बयान दिया है। अमेरिकी प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि यह समझौता तभी अंतिम रूप ले सकेगा, जब सऊदी अरब अब्राहम समझौते में शामिल होकर इज़राइल के साथ राजनयिक संबंध स्थापित करेगा।
रूस की अंतरराष्ट्रीय समाचार टेलीविजन नेटवर्क रशिया टुडे (Russia Today) (RT) के मुताबिक, व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दृष्टिकोण से यह डील इज़राइल के साथ संबंध सामान्य करने की शर्त पर आधारित है। उन्होंने बताया कि इस संबंध में सऊदी नेतृत्व के साथ बातचीत जारी है और अमेरिका को उम्मीद है कि रियाद जल्द ही अब्राहम समझौते का हिस्सा बनेगा।
हालांकि, बुधवार को जब अमेरिका और सऊदी अरब के बीच परमाणु सहयोग समझौते की घोषणा की गई थी, तब इस तरह की किसी शर्त का सार्वजनिक रूप से उल्लेख नहीं किया गया था। वहीं, सऊदी अरब पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि जब तक फिलिस्तीनी राज्य के गठन की दिशा में ठोस प्रगति नहीं होती, तब तक वह इज़राइल को औपचारिक मान्यता नहीं देगा।
अमेरिकी ऊर्जा विभाग के अनुसार, ऊर्जा सचिव क्रिस राइट और सऊदी ऊर्जा मंत्री प्रिंस अब्दुलअज़ीज़ बिन सलमान (US Department of Energy, Energy Secretary Chris Wright and Saudi Energy Minister Prince Abdulaziz bin Salman) ने तथाकथित ‘123 परमाणु समझौते’ और परमाणु सुरक्षा उपायों से जुड़े एक अन्य समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इसके तहत अमेरिकी तकनीक और विशेषज्ञता की मदद से सऊदी अरब अपना नागरिक परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम विकसित कर सकेगा और भविष्य में परमाणु रिएक्टर स्थापित कर सकेगा।
रिपोर्टों के मुताबिक, यह समझौता सऊदी अरब को घरेलू स्तर पर यूरेनियम संवर्धन की अनुमति भी दे सकता है। हालांकि, इसमें अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (International Atomic Energy Agency’s) (IAEA) के ‘एडिशनल प्रोटोकॉल’ को अनिवार्य नहीं बनाया गया है। यह प्रोटोकॉल निरीक्षकों को व्यापक अधिकार देता है ताकि किसी भी अघोषित परमाणु गतिविधि का पता लगाया जा सके।
इस प्रावधान को लेकर अमेरिका में परमाणु अप्रसार विशेषज्ञों और कई सांसदों ने चिंता जताई है। उनका कहना है कि यदि सऊदी अरब को यूरेनियम संवर्धन की अनुमति मिलती है, तो भविष्य में वही तकनीक परमाणु हथियार बनाने की दिशा में भी इस्तेमाल की जा सकती है। इससे पश्चिम एशिया में परमाणु हथियारों की नई होड़ शुरू होने का खतरा बढ़ सकता है।
सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (Saudi Crown Prince Mohammed bin Salman) पहले भी कह चुके हैं कि यदि ईरान परमाणु हथियार हासिल करता है, तो सऊदी अरब भी उसी दिशा में कदम उठाएगा।
यह समझौता अमेरिकी कंपनियों के लिए अरबों डॉलर के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निवेश का रास्ता खोल सकता है। हालांकि, अमेरिकी एटॉमिक एनर्जी एक्ट (US Atomic Energy Act) के तहत इसके लागू होने से पहले इसे अमेरिकी कांग्रेस की समीक्षा और मंजूरी की प्रक्रिया से गुजरना होगा। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि कांग्रेस द्वारा इस समझौते को रोक पाना आसान नहीं होगा, क्योंकि राष्ट्रपति के वीटो को पलटने के लिए दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी।
