
काठमांडू : (Kathmandu) नेपाल के सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of Nepal) ने संघीय या प्रदेश सांसदों को ‘निर्वाचन क्षेत्र विकास कार्यक्रम’ (‘Constituency Development Program’) के नाम पर बजट देने की व्यवस्था को ‘विधायिकी अधिकार का गंभीर विचलन’ करार दिया है।
दरअसल, जनमत पार्टी के सतीश सिंह (Satish Singh of the Janamat Party) के नेतृत्व में गठित मधेश प्रदेश सरकार ने 7 सितंबर, 2024 को प्रत्यक्ष निर्वाचित सांसदों को 5 करोड़ रुपये और समानुपातिक सांसदों को 1.5 करोड़ रुपये प्रति सांसद की दर से निर्वाचन क्षेत्र के विकास के लिए योजनाएं देने का निर्णय लिया था। इस निर्णय के खिलाफ कानून के कुछ छात्रों ने सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दायर की थी।
इसी याचिका पर सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने सांसदों को योजनाओं के चयन और बजट परिचालन का अधिकार देने वाले निर्वाचन क्षेत्र विकास कार्यक्रम को शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के विपरीत बताया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस तरह के कार्यक्रम संचालित करना कानून बनाने वालों के लिए उचित नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या के अनुसार सांसदों को बजट स्वीकृत करने और कार्यपालिका के खर्च की निगरानी करने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है, लेकिन इस विशेषाधिकार का यह अर्थ नहीं निकाला जा सकता कि सांसदों को स्वयं बजट परिचालन और खर्च करने का अधिकार भी मिल गया है।
न्यायाधीश सपना प्रधान मल्ल और सुनीलकुमार पोखरेल (Justices Sapana Pradhan Malla and Sunil Kumar Pokharel) की पीठ ने 26 दिसंबर, 2024 को दिए फैसले के पूर्ण पाठ में कहा है, “जिस काम की संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था ने सांसदों से कल्पना ही नहीं की है, उसी काम के लिए सांसदों के विवेकाधिकार में बजट आवंटित करना विधायिकी अधिकार का गंभीर विचलन है।”
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए निर्वाचन क्षेत्र को एक इकाई के रूप में मान्यता दी गई है, लेकिन इसे विकास प्रशासन का आधार मानते हुए निर्वाचन क्षेत्र विकास कोष या इसी तरह के अन्य कोषों के औचित्य पर सवाल उठता है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ऐसे कार्यक्रमों को संवैधानिक, कानूनी और लोकतांत्रिक मूल्यों एवं मान्यताओं की कसौटी पर उचित नहीं ठहराया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानून बनाने और बजट पारित करने वाली संस्था के सदस्य स्वयं योजनाओं का चयन करने और बजट परिचालन करने वाले नहीं बन सकते। ऐसा होने पर ‘संवैधानिक नैतिकता का अवमूल्यन होने के साथ-साथ वित्तीय अनुशासन, निष्पक्षता और सुशासन की मूल भावना पर भी आघात पहुंचेगा।’
सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाल ही में प्रकाशित फैसले के पूर्ण पाठ में कहा गया है, ‘यदि सांसद विकास निर्माण की योजनाओं का चयन करने, स्वयं के लिए बजट आवंटित करने और बजट स्वयं खर्च करने की प्रक्रिया में प्रत्यक्ष रूप से शामिल होते हैं, तो यह शक्तियों के पृथक्करण तथा नियंत्रण और संतुलन के संवैधानिक सिद्धांत का उल्लंघन होगा।’
नेपाल के संविधान में शक्तियों के पृथक्करण तथा नियंत्रण और संतुलन को संविधान की अपरिवर्तनीय मूलभूत संरचना का अभिन्न अंग माना गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि ऐसी स्थिति में सांसदों को कार्यपालिका के समानांतर भूमिका नहीं निभानी चाहिए।
