
अब परेशान करने वाले बेटे-बहू को घर से बाहर कर सकेंगे माता-पिता
लखनऊ के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पलटा हाईकोर्ट का फैसला
नई दिल्ली : (New Delhi) सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि बुजुर्ग माता-पिता (elderly parents) को अपने घर में सम्मान और सुरक्षा के साथ रहने का अधिकार है। यदि बेटे या बहू का घर में रहना बुजुर्ग के भरण-पोषण या सुरक्षा में बाधा बन रहा है, तो उन्हें घर से बेदखल करने का आदेश दिया जा सकता है। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे (Justices P.S. Narasimha and Alok Aradhe) की पीठ ने कहा कि बढ़ती उम्र का मतलब अपमान या असुरक्षा के साथ जीवन बिताना नहीं है। सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने बुजुर्गों के साथ कितना सम्मान और सुरक्षा का व्यवहार करता है।
लखनऊ के मकान से जुड़ा मामला
सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला लखनऊ के रवि कांत गुप्ता (Ravi Kant Gupta of Lucknow) से जुड़े मामले में सुनाया। उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी, जिसमें उनके बेटे और बहू को मकान से बेदखल करने के एसडीएम और जिला मजिस्ट्रेट के आदेश को रद्द कर दिया गया था। रवि कांत गुप्ता लखनऊ के विकास नगर में रहते हैं। उनकी 81 वर्षीय मां को घर छोड़कर वृद्धाश्रम में रहना पड़ा था। आरोप था कि उनके पोते ने उन्हें घर में रहने नहीं दिया और उनके साथ ऐसा व्यवहार किया गया कि उन्हें घर छोड़कर वृद्धाश्रम जाना पड़ा। इसके बाद एसडीएम ने 15 नवंबर 2022 को बेटे को मकान से बेदखल करने का आदेश दिया। जिला मजिस्ट्रेट ने 9 अगस्त 2023 को इस आदेश को बरकरार रखते हुए बेटे और बहू को मकान खाली करने का आदेश दिया।
हाईकोर्ट ने रद्द कर दिए थे आदेश
बेटे और बहू ने एसडीएम और जिला मजिस्ट्रेट के आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने कहा था कि माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत ट्रिब्यूनल को वरिष्ठ नागरिक की संपत्ति से उसके बच्चों को बेदखल करने का अधिकार नहीं है। इसके बाद हाईकोर्ट ने दोनों आदेश रद्द कर दिए थे।
सुप्रीम कोर्ट ने पलटा हाईकोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया। कोर्ट ने कहा कि वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण और सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए जरूरत पड़ने पर ट्रिब्यूनल बेदखली का आदेश दे सकता है।
ट्रिब्यूनल को सिविल कोर्ट जैसी शक्तियां
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 2007 के कानून की धारा 7 के तहत मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल बनाए गए हैं। धारा 8 के तहत उन्हें कुछ मामलों में सिविल कोर्ट जैसी शक्तियां प्राप्त हैं। वहीं, धारा 27 सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र को सीमित करती है। ऐसे में कानून के उद्देश्य को पूरा करने के लिए ट्रिब्यूनल आवश्यक और सहायक आदेश जारी कर सकता है।
पुराने फैसलों का भी दिया हवाला
सुप्रीम कोर्ट ने एस. वनिता बनाम डिप्टी कमिश्नर (S. Vanitha v. Deputy Commissioner) (2021) के फैसले का भी हवाला दिया। इसमें कोर्ट ने माना था कि वरिष्ठ नागरिक के भरण-पोषण और सुरक्षा के लिए जरूरी होने पर ट्रिब्यूनल बेदखली का आदेश दे सकता है। कोर्ट ने कहा कि यही कानूनी स्थिति बाद के समटोला देवी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (2025) और कमलकांत मिश्रा बनाम एडिशनल कलेक्टर (2025) मामलों में भी दोहराई गई।
क्या है 2007 का कानून?
माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत 60 वर्ष या उससे अधिक उम्र के वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण और सुरक्षा के लिए कानूनी व्यवस्था की गई है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बुजुर्गों को अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए दूसरों पर निर्भर रहने के बावजूद उपेक्षा या असुरक्षा का सामना न करना पड़े।
