
बॉम्बे हाईकोर्ट ने खारिज की पति की याचिका
मुंबई : (Mumbai) पति-पत्नी के बीच होने वाली सामान्य नोकझोंक और छोटे-मोटे मतभेद क्या मानसिक क्रूरता माने जा सकते हैं? बॉम्बे हाईकोर्ट (Bombay High Court) की नागपुर पीठ ने इस सवाल का जवाब देते हुए साफ कहा है कि केवल चिढ़, नाराजगी या रोजमर्रा के झगड़े तलाक का आधार नहीं बन सकते। कोर्ट ने एक 44 वर्षीय व्यक्ति की तलाक की याचिका खारिज कर दी, जिसने पत्नी पर खुद के और अपनी मां के साथ झगड़ा करने तथा मानसिक क्रूरता करने का आरोप लगाया था। न्यायमूर्ति उर्मिला जोशी फाल्के और न्यायमूर्ति राज वाकोड़े (Justice Urmila Joshi Phalke and Justice Raj Wakode) की पीठ ने बुधवार को दिए आदेश में कहा कि क्रूरता ऐसी होनी चाहिए, जिसमें पति-पत्नी से साथ रहने की उम्मीद करना उचित न रह जाए।
सामान्य झगड़े को क्रूरता क्यों नहीं माना जा सकता?
उच्च अदालत ने कहा कि हर वैवाहिक जीवन में कुछ नोकझोंक और मतभेद होते हैं, और इन्हें सीधे मानसिक क्रूरता नहीं कहा जा सकता। पीठ के अनुसार, क्रूरता का आकलन कुछ अलग-अलग घटनाओं के आधार पर नहीं होना चाहिए, बल्कि इसके लिए पति-पत्नी के पूरे वैवाहिक जीवन को एक साथ देखना जरूरी है।
बदलते समय के साथ क्रूरता की परिभाषा भी बदली
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि समय के साथ जीवन, वैवाहिक जिम्मेदारियों और रिश्तों की प्रकृति में बदलाव आया है। इसलिए एक मामले में जिस व्यवहार को क्रूरता माना जाए, जरूरी नहीं कि दूसरे मामले में भी वही स्थिति लागू हो। पीठ के अनुसार यह भी देखना जरूरी है कि पति-पत्नी किस तरह का जीवन जी रहे हैं, उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति क्या है, तथा उनकी संस्कृति और जीवन में किन मानवीय मूल्यों को महत्व दिया जाता है।
पति ने पत्नी पर क्या-क्या आरोप लगाए?
दोनों की शादी 2003 में हुई थी। पति का कहना था कि पत्नी ने उसे और उसके माता-पिता को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया। उसका दावा था कि पत्नी का स्वभाव गुस्सैल था और वह छोटी-छोटी बातों पर उसकी मां से झगड़ा करती थी। पति ने यह भी आरोप लगाया कि संतान न होने के लिए पत्नी ने उसे जिम्मेदार ठहराया। उसके मुताबिक, पत्नी 2011 में ससुराल छोड़कर चली गई थी।
पत्नी ने पति और ससुराल वालों पर क्या आरोप लगाए?
पत्नी ने पति के आरोपों से अलग कहानी बताई। उसका कहना था कि वह पति के घर वापस आई थी, लेकिन पति ने उसके साथ रहने से इनकार कर दिया। महिला ने आरोप लगाया कि संतान न होने के कारण पति और उसके परिवार के सदस्य उसके साथ बुरा व्यवहार करते थे।
पारिवारिक अदालत के फैसले को दी थी चुनौती
इस मामले में पारिवारिक अदालत पहले ही पति को तलाक देने से इनकार कर चुकी थी, साथ ही उसे पत्नी को हर महीने 5,000 रुपये भरण-पोषण देने का आदेश दिया गया था। पति ने इसी फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि तुच्छ मुद्दों पर लगाए गए आरोपों को क्रूरता नहीं माना जा सकता, और केवल सामान्य आरोपों के आधार पर विवाह समाप्त करने का आदेश नहीं दिया जा सकता।
