
मुंबई : (Mumbai) बॉम्बे हाईकोर्ट (Bombay High Court) की कड़ी फटकार के बाद अन्न एवं औषधि प्रशासन (Food and Drug Administration) (FDA) ने पुणे स्थित सिप्ला फार्मा एंड लाइफ साइंसेज लिमिटेड की ‘कैरी एंड फॉरवर्डिंग’ इकाई का दवा बिक्री लाइसेंस रद्द करने का फैसला वापस ले लिया है। अदालत ने एफडीए की कार्रवाई को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत बताते हुए विभाग के तौर-तरीकों पर गंभीर सवाल उठाए थे। मामले को लेकर आयोजित प्रेस वार्ता में एफडीए आयुक्त तुकाराम मुंढे (FDA Commissioner Tukaram Mundhe) से जब अदालत की टिप्पणी—‘क्या आप खुद को भगवान समझते हैं?’—के संदर्भ में सवाल किया गया, तो उन्होंने कहा कि वह भगवान नहीं, बल्कि तुकाराम मुंढे और एक लोकसेवक हैं। उन्होंने कहा कि लोकसेवक के रूप में वह अपना काम कर रहे हैं और उन्हें अपने दायित्व को लेकर कोई भ्रम या अस्पष्टता नहीं है।
‘गलती हुई तो सुधार करेंगे’
मुंढे ने कहा कि कार्रवाई के दौरान यदि विभाग से कोई त्रुटि या गलती हुई है और अदालत ने उसे इंगित किया है, तो उस पर गंभीरता से विचार किया जाएगा। उन्होंने कहा कि विभाग आवश्यक सुधार करने के लिए तैयार है।
हाईकोर्ट ने कार्रवाई के तरीके पर जताई थी नाराजगी
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने एफडीए की कथित अति-सख्त कार्रवाई पर नाराजगी जताई थी। अदालत ने टिप्पणी की थी कि छोटी-मोटी गलतियों के लिए सीधे कारोबार बंद करना या लाइसेंस रद्द करना ‘मच्छर मारने के लिए तलवार चलाने’ जैसा है।
जल्दबाजी में कठोर कार्रवाई पर सवाल
अदालत ने कहा था कि नियमों का पालन सुनिश्चित कराने के दौरान व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए। अदालत के मुताबिक, एफडीए की कार्रवाई में जल्दबाजी और जरूरत से ज्यादा कठोरता दिखाई दी। हाईकोर्ट की टिप्पणियों के बाद एफडीए ने सिप्ला की पुणे स्थित इकाई का दवा बिक्री लाइसेंस रद्द करने का अपना फैसला वापस ले लिया है। मामले ने दवा नियामक की कार्रवाई, प्राकृतिक न्याय और प्रशासनिक विवेक के इस्तेमाल को लेकर बहस तेज कर दी है।
